वट सावित्री पूजा क्यों मनाया जाता है और कब है वट पूजा ?

वट सावित्री व्रत की मान्यता है। कि इस दिन माता सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और सच्ची भक्ति से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लाई थी तभी से यह प्रथा प्रचलित हुई है। इसीलिए हर स्त्री के लिए यह व्रत वरदान और फलदाई माना जाता है।

वट सावित्री पूजा क्यों मनाया जाता है ?

हिन्दू धर्म के मान्यता के अनुसार इस वर्ष भी वट सावित्री व्रत इस साल 10 जून 21 मनाया जाएगा। सभी महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए रखती है। सभी व्रत में से वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। सुहागिन स्त्री अपने पति की लंबी आयु के लिए पूजा करतीं हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक जो भी स्त्री इस व्रत को सच्चे मन से करती है। उनके पति पर जो भी परेशानी आती है सारी परेशानी दूर हो जाती है। यह व्रत हर साल की तरह इस वर्ष भी ज्येष्ठ माह की अमावस्या के दिन रखा जाता हैं। सभी स्त्री यह व्रत निर्जला रखती हैं।

शुभ मुहूर्त

वट सावित्री व्रत हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 10 जून 21 को व्रत रखा जाएगा ज्येष्ठ माह की अमावस्या को यह व्रत होता है। अमावस्या तिथि 9 जून को दोपहर 1 बजकर 57 मिनट से शुरू होगी 10 जून शाम 4 बज कर 22 मिनट तक रहेगा।

पूजा विधि

सुबह सवेरे घर में साफ सफाई करने के बाद नहा धोकर साफ स्वच्छ कपड़े पहने फिर सबसे पहले सूर्य देव को जल में करें। वट पूजा वट वृक्ष के नीचे किया जाता है। फिर एक बांस की टोकरी लेंगे फिर उसमे साथ तरह के अनाज रखेंगे। कपड़े को दो टुकड़े करके टोकरी को ढक दिया जाता हैं। एक तरफ देवी सावित्री जी की प्रतिमा रखी जाती है। वट वृक्ष पर महिलाएं जल चढ़ा कर कुमकुम अक्षत चढ़ाती है। उसके बाद सूत के धागे से वट वृक्ष को बांध कर अपने पति की दीर्घायु की कामना करती है। ऐसे वट सावित्री का व्रत समस्त परिवार की सुख सम्पन्नता के लिए किया जाता है।

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